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برېښنايي تذکرو کې د ۵۴ قومونو د نومونو لیکلو پرېکړې ګڼ غبرګونونه پارولي

د افغانستان د ملي احصایې او معلوماتو ادارې په يو تازه اقدام کې په برېښنايی تذکرو کې د ۵۴ قومونو د نومونو د لیکلو پریکړه وکړه چې دغه اقدام له ګڼو غبرګونونو سره مخ شو.


ځینې سیاسي رهبران وايي، دغه کار افغانستان د یو شمېر لویو قومونو ویش په وړو قومونو بولي، خو ځینې یې بیا د قومونو د حقوقو د ټینګښت په معنی بولي.


د ملي مصالحې عالي شورا مشرعبدالله عبدالله په خپل فیسبوک پاڼه لیکلي چې د لویو قومونو ویش پر وړو قومونو یو غیر علمي ګام دی.




ښاغلي عبدالله لیکي، په داسې حال کې چې افغانستان اوس مهال په لویو مسئلو کې یووالي ته اړتیا لري، د داسې مسئلو مخه باید ونیول شي او افغانان باید یووالي ته راوبلل شي.


د جمهور رئیس دوهم مرستیال سرور دانش په خپل فیسبوک پاڼه لیکي چې د قومونو پېژندنه مسلکي، علمي، تاریخي او فرهنګي کار ته اړتیا لري او دا کار باید دومره ساده او په بېړه ترسره نه شي.




ښاغلي دانش نن یکشنبه (د کب ۲۴مه) یو ځل بیا په خپل فیسبوک پاڼه لیکلي چې که هره تېروتنه او ستونزه په خپور شوي لېست کې شوي وي اړوندې ادارې یې د سمون لپاره اقدام کوي.


هغه لیکلي چې حکومت هېڅ کله هم داسې ګام نه پورته کوي چې د حقایقو خلاف وي.


د ولسي جرګې مشر میر الرحمان رحماني هم د یوې اعلامې په خپرولو سره ویلي چې د ملي احصايې او معلوماتو ادارې دا ګام د هغه کړیو کار دی چې له مودو راهیسې د دې نظام د کمزورۍ او د قومونو ترمنځ د بې اتفاقي لپاره هڅې کوي.




د افغانستان د جمعيت اسلامي ګوند رئیس صلاح الدین رباني د یوې اعلامیې په صادرولو سره ویلي: "دا پروګرام د هغو تحرکاتو دوام دی چې له څه مودې راهیسې د نظام د کمزوره کولو، قومي مسایلو ته د لمن وهلو او یو موټي افغانستان ته د ګذار ورکولو په موخه د یوې خاصې کړۍ له خوا پیل شوی دی."




د جمعیت اسلامي ګوند اجرايي مشر عطا محمد نور او د مسعود بنسټ مشر احمد ولي مسعود هم ویلي چې د ملي احصایې او معلوماتو ادارې دا اقدام د ملي یووالي له روحیې سره په ټکر کې او ستونزې رامنځته کوونکی دی.


دغو حکومتي چارواکو او سیاسي مشرانو، د ملي احصایې د ادارې د دې اقدام د سمون غوښتنه کړې ده.


خو د افغانستان د جمهور رئیس فرهنګي سلاکار شاه حسین مرتضوي د سیاسي مشرانو د دې غبرګون په تړاو په خپله فیسبوک پاڼه کې لیکلي چې دا کسان وزارتونو، سفارتونو او نور پوستونو ته د اشخاصو د ور پېژندنې پر مهال یوازې خپل د زامنو نومونه وړاندې کوي.




نوموړی وايي چې خلک باید نور د قوم په نوم ونه غولول شي او باید د قوم په نوم سیاسي سوداګري نوره ختمه شي.


د افغانستان د ملي احصایې او معلوماتو اداره وايي چې دا اقدام د قومي مشرانو تر وار- وار غوښتنو وروسته شوی دی.


د دغې ادارې ویاندې روبینا شهابي ازادي راډیو ته وویل: "د افغانستان د نافذه قوانینو پر بنسټ دې برخه کې کوم بندیز نشته، د افغانستان د سترې محکمې له خوا د اساسي قانون د څلورمې مادې درېیم بند تفسیر شوی او وضاحت لري چې په تذکره کې له ۱۴ ګونې اقدام پرته د نورو قومونو د نومونو لیکل قانوني ممناعت نه لري."




په ورته وخت کې د افغانستان د اقلیتونو د انسجام شورا رئیس احمد شکیب ثاني د یکشنبې په ورځ په کابل کې یوې خبري غونډې ته وویل چې قومي اقلیتونه خپلو د ښکاروندۍ د حقونو په خاطر په برېښنايي تذکرو کې د خپلو قومونو د نومونو لیکل غواړي.


دی وايي: "موږ ډېرې مبارزې وکړې چې په پایله کې یې په ۱۳۹۶ کال کې سترې محکمې یو قرار صادر کړ چې په کې راغلي، په قانون کې چې ۱۴ قومه راغلي له هغې پرته د نورو قومونو نومونه هم باید په تذکرو کې ولیکل شي."


مخکې تردې په برېښنايي تذکرو کې د ملیت او قوم د لیکلو په تړاو د جمهور رئیس تقنیني فرمان له تُندو غبرګونونو سره مخ شوی و.


جمهور رئیس غني د یو تقنیني فرمان په صادرولو د ۱۳۹۳ کال د تصویب شوي قانون په شپږمه ماده کې د تعدیل غوښتنه کړې وه چې وروسته له ډېرو جنجالونو بیا دا تعدیلات د ملي شورا د دواړو جرګو له خوا تصویب شول.


وروسته تر هغې د تذکرې د مشخصاتو په فورم کې د بهرنۍ ژبې په توګه د فارسي ژبې لیکلو هم غبرګونونه راوپارول چې د ملي احصایې او معلوماتو ادارې بیا دا تخنیکي ستونزه وګڼله او سمون یې په کې راوست.

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