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د ښځو ضد تاوتریخوالي د له‌منځه وړلو نړیواله ورځ؛ افغان ښځې اوس کومې ستونزې ګالي؟

د نومبر ۲۵مه د ښځو پر وړاندې د تاوتریخوالي د له‌منځه وړلو نړیواله ورځ په افغانستان کې داسې مهال نمانځل کېږي چې یو شمېر افغان ښځې او نجونې د کار او زده‌کړو له حقه محرومه شوې دي.


د طالبانو تر واکمنېدو راوروسته په دغه هېواد کې ډېرې ښځې له کار، زده‌کړو او سپورټ پاتې دي. 


تازه طالبانو د تمثیل په برخه کې د ښځو له کار کولو سره مخالفت ښودلی او د ښځینه خبریالانو د کار په برخه کې یې هم یو شمېر محدویتونه وضع کړي دي. 


د بشري حقونو د څار نړیوالې ادارې د ښځو د برخې مشره وايي، د طالبانو په واکمنۍ سره په افغانستان کې د ښځو او نجونو اوږدمهاله راتلونکې ډېره تیاره ده. 


یو له دغو ښځو ۲۸ کلنه مدینه ده چې د پلار له مړینې وروسته‌یې خپل د کورنۍ اقتصادي ستونزې د نورو ښځو په سینګارولو هوارولې. 


مدینه وايي: "ټول ډارېږي، کار نه‌شته، پېرېدونکي نه‌شته، زه خپله وزګاره يم، موږ ټول په کور کې کوم عايد نه‌لرو."


دا ځوانه نجلۍ د خپلې پنځه کسيزې کورنۍ یوازنۍ ګټندویه ده، يوه ناروغه مور، دوه خويندې او دوه کوچني وروڼه لري چې د کار توان نه‌لري.




د طالبانو په لاس په افغانستان کې د جمهوري نظام تر سقوط وروسته مدینه ونه‌توانېده چې په سمه توګه کار وکړي او خپل کور ته عاید راوړي، ان تر دې چې نور د خپلې مور د درملو د اخیستلو توان هم نه‌لري. 


لامل‌یې د طالبانو له واکمنېدو راوروسته د مشتریانو کموالی دی. 


مدینه وايي، د خپلې کورنۍ د اقتصادي ستونزو د هواري او اړتیاوو پوره کولو لپاره‌یې د بل کار موندلو هڅه کړې، خو نه‌ده توانېدلې.


نوموړې ازادي راډیو ته وویل: "دا یو تریخ حقیقت دی چې تاسو د ورځې په اوږدو کې د کار په لټه کې یاست او د شپې خالي لاس راشئ، تاسو کورنۍ ته ګورئ او کورنۍ تاسو ته ګوري، څومره ډوډۍ مو راوړې؟ څومره پیسې دې راوړي؟ څومره خواړه دې راوړي؟ بیا هم وږي ویده شي! واقعیت چې د ټولو لپاره ډېره سخته ده."


د ښځو او نجونو او د دوی د حقونو په اړه د طالبانو نظر او لیدلوری ښځو ته نوی نه‌دی. که څه هم طالبان اوس وايي چې د دوی نظر بدل شوی او د اسلامي اصولو په چوکاټ کې به د ښځو حقونه تأمین کړي. 


د مدینې د مور همزولې هم په افغانستان کې د طالبانو د واکمنۍ په تېرو کلونو کې څو کاله ورته، د مجبوریت او محدودیت ساه اخیستله. 


له طالبانو سره د امریکا د سولې د خبرو پر مهال افغان مېرمنو په وار وار د خپلې نامعلومې راتلونکې په اړه اندېښنه ښودلې.




د امریکا د بهرنیو چارو وزارت چارواکو هغه مهال ویلي وو چې دوی به د سولې په بهیر کې د افغان ښځو او نجونو حقونه له پامه ونه‌غورځوي، هغه خبرې چې د ځینو ښځو په باور نه‌دي عملي شوي. 


زمرد ۲۴ کلنه افغانه نجلۍ ده چې د ټولنپوهنې په برخه کې لېسانس لري. 


زمرد وړاندې په حکومت کې کار کاوه، خو د طالبانو له واکمنېدو وروسته وزګاره شوه. 


کورنۍ یې په هرات کې ژوند کوي.


اقتصادي ننګونو دې ته وهڅوله چې کار لپاره کابل ته راشي ، خو له دې خبرې له درې میاشتو تېرېدو راهیسې لا هم وزګاره ده.


زمرد ته هغه مهال د کورنۍ پالنه ورترغاړې شوه چې پلار یې ۱۴ کاله مخکې مغزي سکته وکړه.


دا ځوانه نجلۍ اړ ده چې د کورنۍ د اوو تنو غړو لپاره روزي وګتي.


زمرد ازادي راډیو ته وویل: "زه خپل ځان د دوی په وړاندې مسؤله ګڼم او باید هم دا مسؤلیت ترسره کړم، خو وضعیت داسې راغلی چې زه واقعاً نه‌شم کولای دا مسؤلیت ادا کړم او له همدې امله زه ډېره د کمزورۍ احساس کوم یعنې زه داسې انګېرم چې د دې ستونزو په وړاندې کمزوری یم."


ښوونه او روزنه په تېرو ۲۰ کلونو کې د حکومت او نړیوالې ټولنې په هڅو د افغان مېرمنو او نجونو یو مبرم حق ګرځېدلی و.




افغان مېرمنو په دې موده کې د ماسترۍ او دوکتورا تر کچې پورې د افغانستان دننه او بهر زده‌کړې وکړې، خو په افغانستان کې د طالبانو په بیا واکمنېدو سره دا بهیر تر یو وخته له خنډ او ځند سره مخ شو.


طالبانو نجونو ته له شپږم ټولګي پورته ښوونځیو ته د تګ اجازه نه‌ده ورکړې او د ښځینه زده‌کوونکو برخلیک له یو ناڅرګند حالت سره مخ دی. 


مسکا تازه کابل پوهنتون کې خپلې زده‌کړې پیل کړې وې او د روښانه راتلونکې خوب‌یې لیده. 


مسکا ازادي راډیو ته وویل: "موږ ټول زده‌کوونکي په خپل ژوند کې اوس هېڅ هیله نه‌لرو. موږ ټول له یو نامعلوم برخلیک سره مخ یو، موږ ټول دې ته حیران یو چې څنګه ژوند وکړو، هغه خوبونه چې موږ درلودل، هغه هڅې چې موږ وکړې، دا هر څه بې‌ګټې شول." 


د ښځو او بشري حقونو نړیوال سازمانونه د افغان ښځو اوسني وضعیت ته اندېښمن دي. 


د بشري حقونو د څار نړیوال سازمان د ښځو د برخې مشرې هیدر بار ازادي راډیو ته وویل: "موږ په افغانستان کې د نجونو او ښځو د اوږدمهاله راتلونکي لوی انځور ته ګورو او دا خورا تیاره دی، په ځانګړي ډول د ښځو پر وړاندې د تاوتریخوالي د له‌منځه وړلو په دا نړیواله ورځ."




هیدر بار وايي، ښځې اوس له خپل ساده حق، له زده‌کړو تر سپورت، د فکر او کار له ازادۍ له هر څه بې‌برخې شوې دي. 


خو د مدينې په شان ښځې او نجونې چې خپلو کورونو ته ډوډۍ راوړونکې دي، د طالبانو له حکومت او نړیوالو څخه غواړي چې د دوی له حاله ځان خبر او ښځو او نجونو ته د کار او زده‌کړې اجازه ورکړي. 


طالبانو تر دې مهاله دغو اندېښنو ته غبرګون نه‌دی ښودلی، خو تر دې وړاندې یې په وار وار ویلي چې د اسلامي اصولو سره سم به د ښځو حقونه په پام کې ونیسي او د کار او زده‌کړو زمینه به ورته برابره کړي.

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