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د بشري حقونو څار سازمان: د ښځو په اړه د طالبانو د رهبر فرمان اساسي ژمنه نه‌لري

د طالبانو د مشر ملا هبت‌الله له‌خوا د اسلامي شریعت په چوکاټ کې د ښځو د حقونو په اړه د فرمان له صادرولو وروسته، د بشري حقونو د څار سازمان وايي، په دې فرمان کې د ښځو د حقونو په اړه کومه اساسي ژمنه نه‌ده شوې.


په افغانستان کې د طالبانو د واکمنۍ له نږدې څلور میاشتو تېرېدو او له دوی د ښځو د حقونو د خوندیتوب په اړه د نړیوالو له ډېرو غوښتنو وروسته، د طالبانو مشر د ښځو د  حقونو په اړه دا فرمان صادر کړی.


په دې فرمان کې په زور د ښځو ودول، په بدو کې ورکړه او د دوی له خوښې پرته‌یې نکاح ته مجبورول منع کړل شوي، خو د دوی د دوو بنسټیزو غوښتنو زده‌کړې او کار په اړه هېڅ یادونه نه‌ده شوې.


داسې مهال چې د نړیوالې ټولنې له‌خوا له طالبانو د ښځو د حقونو په برخه کې دوی ته د زده‌کړې او کار د اجازې ورکړه، یو له مهمو شرایطو بلل کېږي.


د دې فرمان په لومړۍ ماده کې د نکاح پر مهال د بالغو ښځو رضایت اړین بلل شوی او په‌کې راغلي، هېڅوک ښځې په زور او اکراه سره نکاح کولو ته نه‌شي مجبورولای، خو دې ټکي ته هم اشاره شوې چې نکاح باید له سیال شخص سره وي چې د فتنې او فساد خطر په‌کې نه‌وي.




د دې فرمان په دوهمه ماده کې لیکل شوي، ښځه مال نه، بلکې اصیل او ازاد انسان دی او هېڅوک‌يې چا ته د صلحې په بدل یعنې "بدو" کې نه‌شي ورکولای.


د افغانستان په یو شمېرو سیمو کې د دوو کورنیو او ان قومونو ترمنځ  د روغې جوړې په پلمه نجونې په بدو یا هم بدل کې ورکول کېږي.


خو په فرمان کې د بالغو نجونو عمر ته هېڅ اشاره نه‌ده شوې چې د بشري حقونو د ملاتړو سازمانو او فعالو بنسټونو له دیده مهم ګڼل کېږي.


د بشري حقونو څار سازمان کې د ښځو د څانګې مسؤله هیدر بار ازادي راډیو سره خبرو کې د دې فرمان د منځ‌پانګې په اړه وویل، په دې فرمان ډېر بحث د واده په اړه شوی، د هغوی د بنسټیزو حقونو په اړه په‌کې څه نه‌دي ویل شوي.


اغلې بار زیاتوي: "دوی کار ته د ښځو او زده‌کړو ته د نجونو د لاسرسي په اړه چې د اندېښنې وړ مسایل دي، اشاره نه‌کوي. زما په اند د لویو مسایلو په اړه د طالبانو نه‌لېوالتیا ښيي او غواړي په دې سره دا ډاد جوړ کړي چې نور مسایل به حل شي. نجونې به زده‌کړو او ښځې به کار ته ستنې شي، په حقیقت کې یې خپلو محافظه‌کارو څېرو ته قناعت نه‌دی ورکړی او تر خوا یې د ښځو په اړه کوم بنسټیزه ژمنه نه‌ده کړې."




د طالبانو د مشر په فرمان کې کونډو ښځو ته هم اشاره شوې او لیکي، کونډه ښځه د خپل اختیار څښتنه ده او د هغه لېور یا بل څوک‌یې په زور نه‌شي نکاح کولای.


په افغانستان کې د ټولنیز عادت له مخې، تر ډېره کونډې مېرمنې د هغه د خاوند له مړینې وروسته، لېوره ته نکاح کېږي.


د دې فرمان درېیمه او څلورمه ماده بیا د ښځو مالي حقونو ته اشاره کوي او په‌کې د مهر او میراث مسایل د ښځو بنسټیز حقونه یاد شوي او ټینګار شوی چې هېڅوک نه‌شي کولای ښځې له دې حقونو محرومې کړي.


د دې فرمان شپږمه ماده بیا د هغو کسانو په اړه ده چې له یو زیات ودونه لري. دوی په دې ماده کې مکلف شوي چې خپلو ټولو ښځو ته د شرعي حکم سره سم حقوق ورکړي او ترمنځ‌يې عدل وکړي.


د ښځو د حقونو فعاله داکتر زهرا محمدي بیا وايي، له دې زیات له طالبانو هیله نه‌لري.


اغلې محمدي وايي: "موږ له دوی تر اوسه خپل کوم حق نه‌دی غوښتی، ځکه موږ له دوی هیله نه‌لرو. دوی ښځې تل ځپلي. موږ له نړیوالې ټولنې غواړو چې دوی تر هغه په رسمیت ونه‌پېژني، تر کله چې دوی ښځې په رسمیت ونه‌پېژني."




خو د طالبانو حکومت ویاند او د اطلاعاتو و فرهنګ وزارت مرستیال ذبیح‌الله مجاهد بیا ازادي راډیو ته وویل، په فرمان کې یاد شوي موضوعات د ښځو اساسي او شرعي حقوق دي چې باید د تل لپاره پای ته ورسېږي او د دوی د زده‌کړو او کار حق د حکومت مسؤلیت دی چې دا ستونزې حل کړي.


ښاغلی مجاهد وايي: "نظام چې کله خلکو ته وايي چې د ښځو حقوق هغه چې په شریعت کې ثابت کړي، ورکړئ، نو هغه چې په نظام باندې لازم دي، هغه به حتماً ورکوي. په دې کار روان دی او ژر به وشي."


د طالبانو مشر هبت‌الله اخند‌زاده د حج او اوقافو او اطلاعاتو او فرهنګ له وزارتونو غوښتي څو د دې فرمان د عملي کېدو لپاره ګامونه پورته کړي.


په دې فرمان کې سترې محکمې ته امر شوی چې د ښځو عرایضو په ځانګړي ډول د کونډو ستونزو ته د رسېدو په برخه کې بې‌پروايي ونه‌کړي.

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